मन करता है सब भूल जाऊं...
जो कुछ है वह लुटा जाऊं...
अपना सब कुछ मिटा जाऊं...
बस एक बार सब कुछ भूल जाऊं...
मन करता है की रूठ जाऊं...
कही अकेले मैं जाकर फूट जाऊं...
एक पत्ते की तरह सूख जाऊं...
एक कलि की तरह मुरझा जाऊं...
बस फिर एक बार रूठ जाऊं...
मन करता है बस सो जाऊं...
रेगिस्तान सा सूख जाऊं...
उजले आसमान मैं चाँद की तरह खो जाऊं...
शांत पानी की तरह बहता चला जाऊं...
बस आज एक बार फिर सब भूल जाऊं...
मन करता है पंछी की तरह उड़ जाऊं...
निर्मल मन से सब कुछ समझ जाऊं...
सब कुछ समझ के समझा जाऊं...
फिर किसी पंछी की तरह उड़ जाऊं...
मन करता है दुनिया को बदल जाऊं...
एक दिए की तरह अँधेरे से लड़ जाऊं...
एक बार फिर दुश्मनी मिटा जाऊं...
सबको हँसना सिखा जाऊं अपनापन लौटा जाऊं...
एक साथ चलना सिखा जाऊं...
बस दुनिता को बदल जाऊं...
आज एक बार सब भूल जाऊं..
सब भूल के...कोरा कागज़ बन जाऊं...
उस कागज़ की श्याही बन जाऊं ...
छोटा सा सन्देश पंहुचाजाऊं ...
बस सब कच भूल जाऊं ...
बस सब कुछ भूल जाऊं...
Terra Incognita
Memories are hard to hold on,Better to put them on words...
Saturday, February 12
Thursday, February 3
अधूरी चाहत
वह यूं रूठे की हम संभल नहीं पाए....
ऐसा छुते की पकड़ नहीं पाए.....
टूट गए हम...भूल गए हर बात...
लेकिन हर बात वोह भूल नहीं पाए...
ऐसा रूठे की हम समझ नहीं पाए...
साथी बहुत हैं....साथ निभाने के लिए...
लेकिन उनका साथ कभी भुला नहीं पाए..
हम तो खड़े थे उनके इंतज़ार मैं....
लेकिन वोह इंतज़ार हमारा कर नहीं पाए...
हमारा साथ निभा नहीं पाए..
यूँ छुते की हम पकड़ नहीं पाए...
अपने दिल से पुछा,लेकिन बता नहीं पाए...
वोह कुछ नहीं बोले,ना कुछ समझ पाए...
चाहत बहुत थी उनके लिए...
वोह ऐसी चाहत समझ नहीं पाए...
ऐसा रूठे की हम संभल नहीं पाए...
खड़े थे,,हाथ हमने बढाये थे...
वोह अपना हाथ बढ़ा नहीं पाए...
आँखों का पानी छुपा नहीं पाए...
यूँ टूटे की हम समझ नहीं पाए...
ऐसा चुहते की हम पकड़ नहीं पाए...
बस ये उनसे हम कह नहीं पाए...
ऐसा छुते की पकड़ नहीं पाए.....
टूट गए हम...भूल गए हर बात...
लेकिन हर बात वोह भूल नहीं पाए...
ऐसा रूठे की हम समझ नहीं पाए...
साथी बहुत हैं....साथ निभाने के लिए...
लेकिन उनका साथ कभी भुला नहीं पाए..
हम तो खड़े थे उनके इंतज़ार मैं....
लेकिन वोह इंतज़ार हमारा कर नहीं पाए...
हमारा साथ निभा नहीं पाए..
यूँ छुते की हम पकड़ नहीं पाए...
अपने दिल से पुछा,लेकिन बता नहीं पाए...
वोह कुछ नहीं बोले,ना कुछ समझ पाए...
चाहत बहुत थी उनके लिए...
वोह ऐसी चाहत समझ नहीं पाए...
ऐसा रूठे की हम संभल नहीं पाए...
खड़े थे,,हाथ हमने बढाये थे...
वोह अपना हाथ बढ़ा नहीं पाए...
आँखों का पानी छुपा नहीं पाए...
यूँ टूटे की हम समझ नहीं पाए...
ऐसा चुहते की हम पकड़ नहीं पाए...
बस ये उनसे हम कह नहीं पाए...
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